आप जिस परिभाषा को पूछ रहे हैं ।वह वैसे तो आप बहुत ज्ञानी एवं ध्यानी हैं आपको कुछ भी बताया नहीं जा सकता किंतु फिर भी जितना मुझे ज्ञान है बताने का प्रयास करता हूं मैं उसे स्पष्ट करके समझाता हूं प्रारंभ में कोई भी नया साधक जब ध्यान करता है तो वह किसी एक केंद्र बिंदु को लक्ष्य करके ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ता है जैसे कोई किसी मूर्ति या चित्र को लक्ष्य करके आगे बढ़ता है। दूसरा कोई प्रकाश बिंदु या सूर्य की आकृति को लक्ष्य करके आगे बढ़ता है । जब उसका मन एक केंद्र बिंदु पर टिक जाता है रुक जाता है स्थिर हो जाता है अब निरंतर उसी आकृति या छवि को देखता रहता है अर्थात दृष्टा बनकर उस छवि को निहारता रहता है ,देखता रहता है तो उस छवि से आकृति से ,प्रकाश बिंदु से वह अपने अंदर ऊर्जा ग्रहण करने लगता है ।जिस प्रकार की भी ऊर्जा का ,जिस प्रकार के भी व्यक्तित्व का उस साधक ने उस ध्यान के बिंदु में कल्पना के द्वारा अपने मस्तिष्क में खाका खींचा है ।उसी प्रकार के गुण साधक के अंदर उतरने लगते हैं ,जब उस बिंदु पर ,उस चित्र पर, ध्यान करते करते साधक की चेतना अत्यंत गहराई युक्त हो जाती है तो धीरे-धीरे वह साधक अपने शरीर का भान खोने लगता है ।उसकी चेतना अनंत गहराई की ओर चली जाती है जब वह अस्तित्व बोध को खोने लगे ।अपने को भूलकर सिर्फ उसके मन मस्तिष्क में वही प्रकाश बिंदु , वही चित्र ,वही मूर्ति ,वही आकृति दिखाई देने लगे ।सिर्फ उसी का बोध हो उसके अलावा किसी भी वस्तु का बोध न रहे सतत यह स्थिति बनी रहे बीच में कोई भी विचार बाधा नहीं पहुंचाए। बस उसी को देखता रहे, यही ध्यान है और जब इससे आगे बढ़ कर साधक स्वयं को और जिसका ध्यान कर रहा था उसको भी विस्मृत कर दे ,उसका भी अस्तित्व बोध ना रहे ।संपूर्ण अस्तित्व विलीन हो जाए ।गायब हो जाए ।अपने शरीर के साथ साथ जिसका ध्यान कर रहा था उसका भी ध्यान बिल्कुल शून्य हो जाए यह समाधि की अंतिम अवस्था निर्विकल्प स्थिति है और जिस ध्यान की अनंत गहराई का ध्यान के रूप में वर्णन किया है उसी को समाधि की प्रारंभिक अवस्था संप्रज्ञात समाधि कहा जा सकता है। संप्रज्ञात में ही जानने योग्य तत्वों को जाना जाता है , समझा जाता है ।जब मन एक केंद्र बिंदु पर पूर्णतया एकाग्र हो जाता है तो साधक जिस किसी भी बिंदु पर अपने मन को ले जाता है ,उसी वस्तु का ,उसी तत्व का आज्ञा चक्र की ऊर्जा सत्य सत्य ज्ञान साधक के समक्ष प्रकट करने लगती है ।आप जिस परिभाषा को पूछ रहे हैं ।
👏 मुझे पता है प्रभु अब आप कहेंगे कि ध्यान किया नहीं जाता ध्यान कुछ करने का नाम नहीं है !!? कुछ नहीं करने का नाम ध्यान है तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ लीजिए 👉कुछ नहीं करने की स्थिति प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं ।वहां पर पहुंचना ही तो लक्ष्य होता है किंतु उससे पूर्व बहुत कुछ करना पड़ता है ।आसन में बैठना भी पड़ता है , प्राणायाम भी करना पड़ता है , मुद्राओं को भी साधना पड़ता है । अब इन सब से गुजरते हुए ध्यान करते हुए ही कुछ नहीं करने तक साधक पहुंच पाता है ।इसलिए जो कुछ नहीं करने की स्थिति है । वह तो फल है लेकिन जो कुछ किया जाता है -वह अष्टांग योग है। योग के साथ चरणों को आप क्रियाविधि अर्थात करना कह सकते हैं और समाधि को वास्तविक ध्यान की स्थिति कह सकते हैं क्योंकि समस्त चरणों का अनुसरण करते हुए जो ध्यान की एकाग्रता प्राप्त होती है ।वह उस की गई क्रिया का फल है। आप सीधे फल पर जाकर स्थिर नहीं हो सकते ।यदि फल को प्राप्त करना है तो क्रियाओं से गुजरना ही पड़ेगा ।बिना क्रियाओं के आप सीधे फल को प्राप्त नहीं कर सकते ।यदि आपने आम का पेड़ लगाया ही नहीं है तो आप आम नहीं खा सकते ।आप सीधा आम की परिभाषा नहीं बता सकते कि आम डायरेक्ट ऐसे पैदा हुआ। उसके लिए पहले पौधे की पूरी संरचना को, उसके जीवनकाल को समझाना पड़ेगा और आम तो अंतिम अवस्था है। उसका मीठा रस बाद में ही पता चलेगा। यहां पर जिसने हमेशा बाजार से आम खाया है ।वह सीधा आम के फल का ही वर्णन करेगा क्योंकि आम के पेड़ का उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है ।यहां पर बाजार से खरीदकर आम खाया जा सकता है किंतु धारणा ध्यान समाधि का विज्ञान ऐसा है जिसे खरीदकर नहीं खाया जा सकता ।यहां पर तो यह पेड़ स्वयं लगाना पड़ेगा ।लगाकर उस पेड़ को पानी खाद देकर सींचना पड़ेगा ।तभी जब यह पेड़ बड़ा हो जाएगा तभी वास्तविक रूप में ध्यान की स्थिति गठित होगी ।"जिसे कुछ नहीं करना कहते हैं " वहां पर कुछ किया नहीं जाता बस हो जाता है किंतु उस होने के पहले बहुत कुछ करना पड़ता है! बहुत कुछ।
⚜🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜
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